महर्षि वेद व्यास की जयंती पर मनाया जाता है गुरु पूर्णिमा का पर्व | कबीर के दोहे | पर्व की पाठशाला
Column: पर्व की पाठशाला | Writer: डॉ. कृपेश ठक्कर
आषाढ़ मास की पूर्णिमा को ‘गुरु पूर्णिमा’ के रूप में मनाया जाता है। इसी दिन भगवान विष्णु के अवतार और आठ चिरंजीवियों में से एक महर्षि वेद व्यास का जन्म हुआ था। इसलिए इसे ‘व्यास पूर्णिमा’ भी कहा जाता है। महर्षि व्यासजी को गुरुओ के गुरु मानते हैं। क्योंकी उन्होंने वेदों की रचना की। लोग ‘गुरु पूर्णिमा’ के दिन को मुख्य रूप से भगवान विष्णु, कृष्ण, महर्षि वेद व्यास और अपने अपने गुरुओं की पूजा करके मनाते हैं। ‘पर्व की पाठशाला’ में आज हम जानेंगे कि हमारी भारतीय संस्कृति में गुरु पूर्णिमा मनाने का विशेष महत्व क्यों है। गुरु पूर्णिमा का उत्सव शुभ एवं मंगलकारी माना जाता है। गुरु पूर्णिमा सभी आस्थावानों और भक्तों के लिए भगवान और गुरु के प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त करने का पर्व है।

कृष्ण द्वैपायन कैसे बने वेद व्यास?
ऋषि पराशर व्यास और माता सत्यवती के पुत्र का जन्म आषाढ़ माह की पूर्णिमा को एक द्वीप पर हुआ था, इसलिए उनका नाम ‘द्वैपायन’ पड़ा, और जन्म के समय उनका रंग श्याम था, इसलिए वह ‘कृष्ण’ कहलाये; इस प्रकार पराशर व्यास के पुत्र ‘कृष्ण द्वैपायन व्यास’ हुए। जिन्हें पिता से वरदान मिला था कि वे समस्त संसार में वे महा ज्ञानी जाने जायेंगे। कृष्ण द्वैपायन बहुत कम उम्र में ही तपस्या करने चले गये। संस्कृत, साहित्य और ज्ञान से समृद्ध कृष्ण द्वैपायन ने वेदों को सरल बनाने के लिए उन्हें चार भागों ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद में विभाजित किया। परिणाम स्वरूप उन्हें ‘वेद व्यास’ के नाम से जाना जाने लगा। उन्होंने मानव जाति को 18 पुराण, महाभारत, श्रीमद्भगवद्गीता और श्रीमद्भागवत पुराण अर्पित किए हैं।
‘महाभारत’ कैसे लिखा गया?
वेद व्यास की महिमा के बारे में बात करें, तो एक बार वेद व्यास हिमालय में तपस्या कर रहे थे। तब भगवान ब्रह्मा वहाँ प्रकट हुए और उन्हें महाभारत की रचना करने का आदेश दिया। व्यास स्वयं महाभारत के साक्षी थे और उसके अभिन्न पात्र भी थे। वह उस कहानी से जुड़े हर एक व्यक्ति को जानते थे एवं उसके इतिहास से भी परिचित थे। उनके लिए तो इस महाकाव्य की रचना करना आसान था। लेकिन उस महाकाव्य को विलंब करने या विराम लिए बिना लिखना असंभव था। इसलिए वेद व्यास भगवान गणेश के पास गए और उनसे लेखक की भूमिका निभाने की प्रार्थना की। भगवान गणेश ने व्यास से एक भी क्षण का विराम लिए बिना लगातार कहानी सुनाने की शर्त रखी। तो व्यासजी ने भी कहानी की जटिलता को समझे बिना कोई भी श्लोक न लिखने का आग्रह किया। भगवान गणेश ने उनकी प्रार्थना स्वीकार कर ली। उन्होंने हिमालय की व्यास गुफा में भगवान गणेश को कथा सुनाना शुरू किया। भगवान गणेश की लिखने की गति इतनी तीव्र थी कि महर्षि व्यास बीच में सांस भी नहीं ले पाते थे।
ऐसे में महर्षि व्यास बीच-बीच में इतनी जटिल बात कह देते थे कि भगवान गणेश को उसे समझने के लिए रुकना पड़ता। तब महर्षि व्यास को सांस लेने का समय मिल जाता था। भगवान गणेश की लिखने में जो गति थी उतनी ही गति महर्षि व्यास की कहानी कहने में थी! इस बीच एक क्षण ऐसा भी आया जब लिखते समय भगवान गणेश की कलम टूट गई। ऐसे में उन्होंने अपना एक दांत निकाल कर उससे लिखना जारी रखा जिससे कथा का लय ना रुके। यह भी एक कारण है की उन्हे ‘एकदंत’ कहा जाता है। माना जाता है की इस महाकाव्य को लिखने में भगवान गणेश को तीन साल लगे। तब मूल ‘जयसंहिता’ का निर्माण हुआ। जब व्यासजी के शिष्य वैशम्पायन ने अर्जुन के प्रपौत्र जनमेजय को यह गाथा सुनाई। माना जाता है कि इसके बाद भरत के वंशजों की गाथा ‘महाभारत’ के नाम से प्रसिद्धध हुई।
ऋषियों में मैं व्यास हूँ! – भगवान कृष्ण
महर्षि व्यास ने एक ओर महाभारत जैसी जटिल रचना की, वहीं दूसरी ओर उन्होंने देवर्षि नारद के अनुरोध पर ‘श्रीमद्भागवत महापुराण’ की भी रचा। श्रीमद्भगवद्गीता के 10वें अध्याय के 37वें श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है कि
वृष्णिनां वासुदेवोस्मि पांडवानां धनंजय: |
मुनिनामप्यहं व्यास: कविनामुशना कवि: ||
अर्थात मैं वृष्णिवंशियों में वासुदेव, पांडवों में अर्जुन और ऋषियों में, मैं व्यास हूँ! तो जब जगद्गुरु, अर्थात पूरे विश्व के गुरु भगवान श्रीकृष्ण ने महर्षि व्यास को अपने के सामन उपमा दी हो, तो इसमें कोई संदेह नहीं कि सनातन संस्कृति हमेशा महर्षि व्यास की जन्म जयंती को ‘गुरु पूर्णिमा’ के रूप में मनाएगी।
गुरु महिमा पर कबीरदास के दोहे
गुरु गोविन्द दोऊ खड़े, काके लागूं पांय ।
बलिहारी गुरु आपने गोविन्द दियो बताय ।।
भावार्थ:- गुरू और गोबिंद (भगवान) एक साथ खड़े हों तो किसे प्रणाम करना चाहिए – गुरू को अथवा गोबिन्द को? ऐसी स्थिति में गुरू के श्रीचरणों में शीश झुकाना उत्तम है जिनके कृपा रूपी प्रसाद से गोविन्द का दर्शन करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
गुरु आज्ञा मानै नहीं, चलै अटपटी चाल ।
लोक वेद दोनों गए, आए सिर पर काल ॥
भावार्थ:- जो मनुष्य गुरु की आज्ञा की अवहेलना करके अपनी इच्छा से कार्य करता है। अपनी मनमानी करता है ऐसे प्राणी का लोक-परलोक दोनों बिगड़ता है और काल रूपी दु:खो से निरन्तर घिरा रहेगा।
आछे दिन पाछे गए, गुरु सों किया न हेत ।
अब पछतावा क्या करै, चिड़ियाँ चुग गईं खेत ॥
भावार्थ:- कबीर दास जी कहते हैं कि बीता समय निकल गया, आपने ना ही कोई परोपकार किया और नाही ईश्वर का ध्यान किया। अब पछताने से क्या होता है, जब चिड़िया चुग गयी खेत।
यह तन विष की बेल री, गुरु अमृत की खान,
शीश दिए जो गुरु मिले तो भी सस्ता जान ॥
भावार्थ:- यह जो शरीर है वो विष जहर से भरा हुआ है और गुरु अमृत की खान हैं। अगर अपना शीशसर देने के बदले में आपको कोई सच्चा गुरु मिले तो ये सौदा भी बहुत सस्ता है।
गुरु कुम्हार शिष कुंभ है, गढ़ि गढ़ि काढ़े खोट ।
अंतर हाथ सहार दै, बाहर बाहै चोट ॥
भावार्थ:- गुरु कुम्हार है और शिष्य घड़ा है। गुरु ही हैं जो भीतर से हाथ का सहारा देकर, बाहर से चोट मार-मारकर और गढ़-गढ़ कर शिष्य की बुराई को निकालते हैं।
गुरु नारायण रूप है, गुरु ज्ञान को घाट ।
सतगुरू वचन प्रताप सो, मन के मिटे उचाट ॥
भावार्थ:- गुरु को साक्षात परमेश्वर का रूप जानों और संसारिक विषयों से मुक्ति प्रदान करने वाला गुरुज्ञान, सरोवर का घाट है । ऐसे गुरु के वाचनों से मन का सारा सन्देह, सारा कलेश मिट जाता है तथा हृदय शान्त हो जाता है।
कबीर गुरु के देश में, बसि जानै जो कोय ।
कागा ते हंसा बनै, जाति वरन कुल खोय ।।
भावार्थ:- जो सद्गुरु के देश में रहता है अर्थात सदैव सद्गुरु की सेवा में अपना जीवन व्यतीत करता है । उनके ज्ञान एवम् आदेशों का पालन करता है वह कौआ से हंस बन जाता है । अर्थात अज्ञान नष्ट हो जाता है और ज्ञान का प्रादुर्भाव होता है । समस्त दुर्गुणों से मुक्त होकर जग में यश सम्मान प्राप्त करता है ।
गुरु पूर्णिमा सभी आस्थावानों और भक्तों के लिए भगवान और गुरु के प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त करने का त्योहार है। (Guru Purnima is a festival for all believers and devotees to express their gratitude to God and Guru.)
आषाढ़ मास की पूर्णिमा को ‘गुरु पूर्णिमा’ के रूप में मनाया जाता है। इसे ‘व्यास पूर्णिमा’ भी कहा जाता है। (The purnima of the month of Ashadh is celebrated as ‘Guru Purnima’. It is also called ‘Vyas Purnima’.)
‘गुरु पूर्णिमा’ के दिन को मुख्य रूप से भगवान विष्णु, कृष्ण, महर्षि वेद व्यास और अपने अपने गुरुओं की पूजा की जाती है। (On the day of ‘Guru Purnima’, mainly Lord Vishnu, Krishna, Maharishi Ved Vyas and our respective Gurus are worshipped.)
गुरु पूर्णिमा को ‘व्यास पूर्णिमा’ भी कहा जाता है। क्योंकि इसी दिन भगवान विष्णु के अवतार और आठ चिरंजीवियों में से एक महर्षि वेद व्यास का जन्म हुआ था। (Guru Purnima is also called ‘Vyas Purnima’ because on this day Maharishi Ved Vyas, an incarnation of Lord Vishnu and one of the eight immortals, was born.)