देवशयनी एकादशी एवं चातुर्मास की महिमा, महत्व, नियम, अर्थ और कथा | पर्व की पाठशाला
Column: कॉलम: पर्व की पाठशाला | Writer: डॉ. कृपेश ठक्कर
आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी अर्थात देवशयनी एकादशी! जिसका वेदों और पुराणों ने बहुत महत्व बताया है। इस एकादशी का महत्व सबसे पहले ब्रह्मा जी ने नारदजी से कहा था, फिर महाभारत में भगवान श्रीकृष्ण ने धर्मराज युधिष्ठिर को समझाया था। इस एकादशी से ही चतुर्मास का आरंभ होता है। चातुर्मास अर्थात वह चार महीने जिनमें सृष्टि के संचालक भगवान विष्णु योग निद्रा में चले जाते हैं और पाताललोक में निवास करते हैं। इसके बाद वे कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी यानी प्रबोधिनी एकादशी को जागते हैं। कहा जाता है की देवशयनी एकादशी में व्रत और चतुर्मास में व्रत करने से पापों से मुक्ति मिलती है और मोक्ष की प्राप्ति होती है। इस चातुर्मास के दौरान आमतौर पर कोई भी शुभ या मंगल कार्य नहीं किए जाते हैं। एक मान्यता के अनुसार भगवान विष्णु की अनुपस्थिति में सृष्टि का संचालन भगवान शिव के हाथों में है। इसलिए चातुर्मास में मुख्य रूप से भगवान विष्णु और लक्ष्मी तथा भगवान शिव और पार्वती की पूजा की जाती है।

एकादशी और चातुर्मास में व्रत, उपवास, तप, ध्यान, पूजा, मंत्र जाप, अन्न दान, स्वाध्याय और ज्ञान प्राप्त करना जैसे कार्य पुण्य और मोक्षदायक माने जाते हैं। लोग निष्ठापूर्वक व्रत और उपवास का पालन करते हैं। और विशेष रूप से भगवान विष्णु और महादेव की पूजा, पंचामृत से स्नान और मंदिर के दर्शन एवं आरती का नियमित पालन करते है। इसके अलावा चातुर्मास में तुलसी पूजा, बरगद के पेड़ की पूजा और जरूरतमंदों को भोजन कराने की भी विशेष महिमा कही है। भारतीय संस्कृति ने हमेशा धर्म और विज्ञान को जोड़ा है। विज्ञान और स्वास्थ्य की दृष्टि से इस दौरान वर्षा ऋतु मे रहने वाली नमी और सब्जियों में रहने वाले कीड़ों के कारण बैंगन, प्याज, लहसुन और हरी सब्जियों को न खाते हुए उपवास करना और विशेष रूप से सूर्यास्त के बाद भोजन न करने का विधान है। इसके अलावा बरसात के मौसम में खराब पाचन को ध्यान में रखते हुए स्वास्थ्य को संतुलित रखने का उद्देश्य से भी उपवास करना फायदेमंद होता है।
क्या है देवशयनी एकादशी की कथा?
वैसे तो देवशयनी एकादशी से चातुर्मास आरंभ होता है। किन्तु देवशयनी एकादशी के प्रारंभ की कथा भी अलौकिक है! यह कहानी असुर राज बलि से जुड़ी है। वह भले ही राक्षसों के राजा हैं। लेकिन महान भक्त प्रह्लाद के पोते और आठ चिरंजीवियों में से एक भी हैं। यह उस समय की बात है जब दादा से प्राप्त भक्ति और कठोर तपस्या के परिणामस्वरूप, उन्होंने पृथ्वी लोक और स्वर्ग लोक पर विजय प्राप्त की। स्वर्ग छिन जाने से व्यथित होकर इंद्र देव माता अदिति के पास पहुँचे। तब देवी अदिति ने भगवान विष्णु से प्रार्थना की। तब भगवान विष्णु ने उनके गर्भ वामन के रूप मे अवतार लिया। इधर भृगुक्षेत्र में नर्मदा के तट पर राजा बलि अश्वमेघ यज्ञ कर रहे थे। तभी भगवान विष्णु वामन अवतार में वहाँ आ पहुँचे। छोटा कद, सिर पर शिखा और यज्ञोपवीत पहने उस प्रभावशाली बालक को देखकर राजा बलि आश्चर्यचकित रह गये। औपचारिक स्वागत और पूजा के बाद राजा ने दान मांगने के लिए कहा। वामन ने दान में केवल तीन पग भूमि मांगी। ऐसी विचित्र माँग सुनकर राजा चौंक गए। अपना वचन पूरा करने उन्होंने कलश भरा और दान करने का संकल्प लिया। संकल्प लेते ही वामन भगवान ने विराट रूप धारण कर लिया और पहले ही पग में संपूर्ण पृथ्वी को ढक लिया। दूसरे कदम में पूरा स्वर्ग नाप लिया। भगवान की महिमा देखकर बलि राज स्तब्ध रह गये।

उन्होंने वामन रूप में भगवान विष्णु को पहचान लिया। जब भगवान के पास तीसरा पग रखने के लिए कोई स्थान नहीं बचा तो बलि राजा ने भगवान से उनके श्रीचरणों को उनके सिर पर रखने का अनुरोध किया। बलिराज की भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान ने उसे पाताललोक का राजा बना दिया और कलियुग तक शासन करने का आशीर्वाद दिया। आश्चर्य की बात तो तब हुई जब भक्त ने भगवान से वरदान में उन्ही की माँग लिया! बलिराज ने भगवान विष्णु से अपने साथ रहने का अनुरोध किया। भक्त की इच्छा पूरी करने के लिए भगवान विष्णु योगनिद्रा में चले गए और राजा बलि के साथ पाताल लोक सिधारे। कहानी यहीं नहीं रुकती! सृष्टि का संतुलन बनाए रखने के लिए भगवान विष्णु के चार माह तक पाताललोक में रहने और प्रबोधिनी एकादशी को पुन: लौटने की कथा भी पुराणों में पाई गई है।
चातुर्मास में भले ही भगवान विष्णु भूलोक में प्रत्यक्ष नहीं रहते। किन्तु ‘विश्वाधारं गगन सदृशम’ ऐसे भगवान विष्णु तो समस्त जगत के आधार और पूर्ण अवकाश मे व्याप्त हो भक्त के ह्रदय में निवास करते हैं।
देवशयनी एकादशी FAQ
देशयनी एकादशी आषाढ़ महीने की शुक्ल पक्ष की एकादशी को मनाई जाती है।
चातुर्मास आषाढ़ महीने की देवशयनी एकादशी से शुरू हो कर कार्तिक महीने की प्रबोधिनी एकादशी तक होता है।
चातुर्मास में भगवान विष्णु और लक्ष्मी तथा भगवान शिव और पार्वती जी की पूजा करनी चाहिए। इसके अलावा व्रत, उपवास, मंत्र जाप, अन्न दान और ज्ञान लेने जैसी प्रवृतियाँ करनी चाहिए।
वामन, भगवान विष्णु के अवतार हैं।
जब असुर राज बलि ने पृथ्वी और स्वर्ग लोक जीत लिए तब भगवान विष्णु ने वामन अवतार ले कर उनसे दान में तीन पग भूमि मांगी। पहले पग मे पृथ्वी और दूसरे कदम पर स्वर्ग को पा लिया था। तीसरे पग के लिए जब कोई स्थान ना रहा तब राजा बलि भगवान को पहचान गए और अपना मस्तक उनके चरणों में रख दिया।