हिंदी मिज़ाज | Hindi Mijaaj

अपना मिज़ाज, हिंदी मिज़ाज

Uncategorized

इंदिरा एकादशी व्रत करने से 7 पीढ़ियों के पितरों को मिलता है मोक्ष | जानिए इस एकादशी व्रत की पूजा विधि और महत्व | पर्व की पाठशाला

Column: पर्व की पाठशाला | Writer: डॉ. कृपेश ठक्कर

‘इंदिरा एकादशी’ श्राद्ध पक्ष यानी की भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष में आने वाली एकादशी है। हमारे शास्त्रों में इस एकादशी की अपार महिमा का वर्णन किया है। इस साल इंदिरा एकादशी 27 सितंबर को है। पिछले अंक में जब हमने श्राद्ध पक्ष की महिमा और पितृ पक्ष में पितरों की मुक्ति के उपायों के बारे में जाना था, तो आज ‘पर्व की पाठशाला’ में इंदिरा एकादशी की महिमा और कथा जानेंगे।

इंदिरा एकादशी व्रत का महत्व

हमारे पुराणों में कहा गया है कि ‘इंदिरा एकादशी’ का व्रत करने से यमलोक से मुक्ति मिल जाती है। महाभारत की एक कथा में स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने धर्मराज युधिष्ठिर को बताया है कि यह एकादशी सभी पापों से मुक्ति दिलाने वाली है। श्राद्ध पक्ष में आने वाली इस एकादशी का व्रत करने से पितरों का उद्धार हो जाता है और व्यक्ति स्वयं पापों से मुक्त हो जाता है। यह भी माना जाता है कि यदि इस तिथि पर पिंडदान, तर्पण या ब्राह्मणों को भोजन कराया जाए तो मृत व्यक्ति को मोक्ष मिलता है।

उपनिषदों में कहा गया है कि भगवान विष्णु की पूजा से पितर संतुष्ट होते हैं। इसलिए इंदिरा एकादशी के दिन भगवान विष्णु की पूजा करने से, पेड़-पौधे लगाने से और पीपल के पेड़ को पानी देने से भगवान भी प्रसन्न होते हैं और पितरों का आशीर्वाद भी मिलता है। इसके अलावा जो पितर अपने ज्ञात-अज्ञात कर्मों के कारण यमराज से दंड भोग रहे हैं, उन पितरों की मुक्ति के संकल्प से किया जाने वाला इंदिरा एकादशी व्रत उन्हें सद्गति और मुक्ति देता है। इसके अलावा व्यक्ति अपने ज्ञात और अज्ञात पापों के प्रायश्चित या मुक्ति के लिए भी इंदिरा एकादशी का व्रत कर सकता है।

यह भी पढ़ें: श्राद्ध पक्ष कब शुरू होता है? | श्राद्ध का महत्व एवं महिमा | श्राद्ध की पौराणिक कथा | पर्व की पाठशाला

इंदिरा एकादशी में क्या करें?

अन्य एकादशियों के व्रत की तरह, इंदिरा एकादशी में भी यही वही नियम लगते है। इस व्रत में सुबह जल्दी उठकर स्नान करके भगवान विष्णु की पूजा की जाती है। इसमें भी शालिग्राम स्वरूप की पूजा का विशेष महत्व बताया है। भगवान विष्णु का गंगा जल, अक्षत और पंचामृत से अभिषेक किया जाता है। पीले चंदन और पीले फूलों से शृंगार किया जाता है। घी का दीपक , फल, तुलसी के पत्ते या भोजन की थाली पिरोसी जाती है। इसके अलावा मौन रहकर मंत्रों का जाप और व्रत कथा का श्रवण किया जाता है। एकादशी के दिन ब्राह्मणों को भोजन कराने के साथ-साथ विशेष पितरों को याद करके यथाशक्ति दान-दक्षिणा या वस्त्र दान करने से पितरों की अतृप्त इच्छाएं पूरी होती हैं। उस पुण्य के फलस्वरूप उन्हें मुक्ति मिलती है। साथ ही व्यक्ति के जीवन में सुख, शांति और समृद्धि आती है।

यदि भोजन या दान देने की अनुकूलता न हो तो मंदिर में श्रद्धापूर्वक दान देकर भी पितरों का कल्याण किया जा सकता है। जिसमें आटा, चावल, दाल, घी, गुड़, चीनी, फल और तुलसी के पत्तों के साथ दक्षिणा को एक थाली में रखकर पास के शिव मंदिर में किसी ब्राह्मण को दे सकते है। इस दिन मंदिर या घर में भजन और सत्संग करने से सभी का कल्याण होता है। ‘इंदिरा एकादशी’ पाप को हरने वाली और मोक्ष प्रदान करने वाली है। हमारे पूर्वजों और बुजुर्गों ने भी इंदिरा एकादशी के महत्व को पीढ़ी-दर-पीढ़ी निभाया है, इसलिए इसकी महिमा युगों-युगों तक बनी रहती है। जिसकी एक प्रचलित कहानी सतयुग से जुड़ी हुई है।

इंदिरा एकादशी की कथा

इस कथा के अनुसार सतयुग में महिष्मती नामक एक बड़ा नगर था, जिसके राजा का नाम ‘इंद्रसेन’ था। वह महाप्रतापी और प्रजावत्सल राजा थे। उनके कर्तव्यनिष्ठ शासन के तहत, उनके राज्य के सभी लोग धर्म, भक्ति और कर्म को मान कर रहते थे। साथ ही राज्य में सुख, शांति और समृद्धि का आनंद था। एक दिन राजा को पता चला कि उनके पिता यमलोक में किसी अज्ञात कर्म की सजा काट रहे हैं। यह जानकर उन्हें दुख हुआ। उसने अपनी समस्या अपने दरबार में उपस्थित ऋषियों और विद्वानों के समक्ष व्यक्त की। उन लोगों ने राजा को इंदिरा एकादशी के व्रत की विधि बताई. राजा इंद्रसेन और उनकी पत्नी ने गंभीर प्रतिज्ञा ली और उपवास किया। साथ ही भगवान विष्णु की पूजा भी की। इसके बाद पिताश्री का स्मरण कर सभी ब्राह्मणों को भोजन कराया और दान-दक्षिणा दी। फलस्वरूप राजा के पिता को यमलोक के कष्ट से मुक्ति मिल गयी। साथ ही राजा को भी जीवन भर सुख, शांति और समृद्धि मिली और मृत्यु के बाद मोक्ष की प्राप्ति हुई। इस प्रकार यह कथा के साथ युगों-युगों से इंदिरा एकादशी का महत्व चला आ रहा है।


इंदिरा एकादशी क्या है?

‘इंदिरा एकादशी’ श्राद्ध पक्ष यानी की भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष में आने वाली एकादशी है।

इंदिरा एकादशी कब है?

इस साल इंदिरा एकादशी 27 सितंबर को है।

श्राद्ध एकादशी कब है?

इस वर्ष श्राद्ध की एकादशी 27 सितंबर को है।

पितृपक्ष एकादशी कब है?

इस साल पितृपक्ष एकादशी 27 सितंबर को है।

इंदिरा एकादशी का व्रत कैसे करें?

इस व्रत में सुबह जल्दी उठकर स्नान करके भगवान विष्णु की पूजा की जाती है। इसमें भी शालिग्राम स्वरूप की पूजा का विशेष महत्व बताया है। भगवान विष्णु का गंगा जल, अक्षत और पंचामृत से अभिषेक किया जाता है। पीले चंदन और पीले फूलों से शृंगार किया जाता है। घी का दीपक , फल, तुलसी के पत्ते या भोजन की थाली पिरोसी जाती है। इसके अलावा मौन रहकर मंत्रों का जाप और व्रत कथा का श्रवण किया जाता है।

इंदिरा एकादशी पर क्या करें?

इंदिरा एकादशी के दिन भगवान विष्णु की पूजा करने से, पेड़-पौधे लगाने से और पीपल के पेड़ को पानी देने से भगवान भी प्रसन्न होते हैं और पितरों का आशीर्वाद भी मिलता है। इसके अलावा जो पितर अपने ज्ञात-अज्ञात कर्मों के कारण यमराज से दंड भोग रहे हैं, उन पितरों की मुक्ति के संकल्प से किया जाने वाला इंदिरा एकादशी व्रत उन्हें सद्गति और मुक्ति देता है। इसके अलावा व्यक्ति अपने ज्ञात और अज्ञात पापों के प्रायश्चित या मुक्ति के लिए भी इंदिरा एकादशी का व्रत कर सकता है।

अगर इंदिरा एकादशी पर ब्राह्मण भोजन नहीं कराया जा सके तो क्या करें?

यदि भोजन या दान देने की अनुकूलता न हो तो मंदिर में श्रद्धापूर्वक दान देकर भी पितरों का कल्याण किया जा सकता है। जिसमें आटा, चावल, दाल, घी, गुड़, चीनी, फल और तुलसी के पत्तों के साथ दक्षिणा को एक थाली में रखकर पास के शिव मंदिर में किसी ब्राह्मण को दे सकते है।

इंदिरा एकादशी की कहानी क्या है?

इस कथा के अनुसार सतयुग में महिष्मती नामक एक बड़ा नगर था, जिसके राजा का नाम ‘इंद्रसेन’ था। वह महाप्रतापी और प्रजावत्सल राजा थे। उनके कर्तव्यनिष्ठ शासन के तहत, उनके राज्य के सभी लोग धर्म, भक्ति और कर्म को मान कर रहते थे। साथ ही राज्य में सुख, शांति और समृद्धि का आनंद था। एक दिन राजा को पता चला कि उनके पिता यमलोक में किसी अज्ञात कर्म की सजा काट रहे हैं। यह जानकर उन्हें दुख हुआ। उसने अपनी समस्या अपने दरबार में उपस्थित ऋषियों और विद्वानों के समक्ष व्यक्त की। उन लोगों ने राजा को इंदिरा एकादशी के व्रत की विधि बताई. राजा इंद्रसेन और उनकी पत्नी ने गंभीर प्रतिज्ञा ली और उपवास किया। साथ ही भगवान विष्णु की पूजा भी की। इसके बाद पिताश्री का स्मरण कर सभी ब्राह्मणों को भोजन कराया और दान-दक्षिणा दी। फलस्वरूप राजा के पिता को यमलोक के कष्ट से मुक्ति मिल गयी। साथ ही राजा को भी जीवन भर सुख, शांति और समृद्धि मिली और मृत्यु के बाद मोक्ष की प्राप्ति हुई। इस प्रकार यह कथा के साथ युगों-युगों से इंदिरा एकादशी का महत्व चला आ रहा है।

इंदिरा एकादशी करने से क्या होता है?

श्राद्ध पक्ष में आने वाली इस एकादशी का व्रत करने से पितरों का उद्धार हो जाता है और व्यक्ति स्वयं पापों से मुक्त हो जाता है।