श्राद्ध पक्ष कब शुरू होता है? | श्राद्ध का महत्व एवं महिमा | श्राद्ध की पौराणिक कथा | पर्व की पाठशाला
Column: पर्व की पाठशाला | Writer: डॉ. कृपेश ठक्कर
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सनातन धर्म में श्रद्धा भाव से पितरों को अर्पण करना ‘श्राद्ध’ कहलाता है! और भाद्रपद माह में सोलह दिनों तक मनाए जाने वाले श्राद्धों के समूह को ‘श्राद्ध पक्ष’ कहा जाता है! इस श्राद्ध पक्ष के दिनों को ‘पितृ तर्पण के दिन’ भी कहा जाता है। श्राद्ध पक्ष भाद्रपद पूर्णिमा से शुरू होता है और इसी माह की अमास के साथ समाप्त होता है। ‘पर्व की पाठशाला’ में हम जानेंगे श्राद्ध पक्ष से जुड़ी रोचक बातें और कहानियां।
याज्ञवल्क्य स्मृति में कहा गया है कि “आयुः प्रजां धनं च विद्यां स्वर्गं मोक्षं सुखनि च। प्रयच्छन्ति एवं राज्यपिता: श्रद्धातर्पिता।” अर्थात श्राद्ध से प्रसन्न होकर हमारे पूर्वज हमें जीवन, संतान, विद्या, स्वर्ग, मोक्ष आदि सुख और राज्य प्रदान करते हैं। आमतौर पर माना जाता है कि मृत्यु के बाद आत्मा पितृ लोक में जाती है। जिसका द्वार श्राद्ध पक्ष में खुलता है। फिर वह आत्मा अपनी अतृप्त इच्छाओं को पूरा करने के लिए अपने परिवार और प्रियजनों के पास आते हैं। इसलिए श्राद्ध में पितरों को याद करके भोजन और दान किया जाता है।
श्राद्ध पक्ष कब शुरू होता है?
श्राद्ध पक्ष भाद्रपद पूर्णिमा 17 सितंबर से शुरू होकर भाद्रपद अमावस्या 2 अक्टूबर को पूर्ण होगा। पूनम का श्राद्ध सभी ऋषियों को समर्पित है इसलिए इसे ‘ऋषि श्राद्ध’ भी कहा जाता है। इसके बाद प्रतिपदा से पितरों का श्राद्ध शुरू हो जाता है। श्राद्ध दो प्रकार के होते हैं। किसी एक व्यक्ति को समर्पित श्राद्ध को ‘एकोदिष्ट श्राद्ध’ तथा तीन पीढ़ियों के पूर्वजों को समर्पित श्राद्ध को ‘पार्वण श्राद्ध’ कहा जाता है। शास्त्रों में तीन पीढ़ियों तक के पूर्वजों के लिए श्राद्ध करने का प्रावधान है। जिस व्यक्ति की मृत्यु जिस तिथि को होती है, श्राद्ध पक्ष में उसी तिथि पर उनका श्राद्ध किया जाता है। जब किसी को पूर्वज की मृत्यु तिथि के बारे में पता न हो, या जब वह जाने-अनजाने में किसी पूर्वज को श्राद्ध देना चाहता हो; तब भाद्रपद की अमावस्या को श्राद्ध कर सकते है। इस लिए उसे ‘सर्व पितृ अमावस्या’ भी कहा जाता है।
श्राद्ध में क्या करें?
मान्यता के अनुसार, श्राद्ध पक्ष में पूर्वज गाय, कौवे और कुत्ते के रूप में घर आते हैं। इसलिए हर परिवार में पहले उन्हें भोजन परोसने की प्रथा है। कौओं के लिए दक्षिण दिशा में विशेष ‘कागवास’ दिया जाता है। गाय की भी पूजा कर उन्हे थाली पिरोसी जाती है। इसके अलावा कुत्तों के लिए भी भोजन बनाया जाता है। मृत व्यक्ति के लिए महिला, पुरुष, बुजुर्ग, युवा, कन्या, बच्चे या वैवाहित युगल को भोजन के लिए आमंत्रित किया जाता है। भोजन में दूध और खीर-पूरी बनाने का विशेष महत्व है। इसके अलावा, पुरुषों को धोती, खेस या अन्य कपड़े दान किए जाते हैं और महिलाओं या युवतियों को साड़ी, चुनर, चूड़ी और शृंगार के साथ आभूषण दान दिए जाते हैं।
श्राद्ध पक्ष में प्रतिदिन दक्षिण दिशा या पनियार में दीपक जलाने का भी विशेष महत्व है। क्योंकि दक्षिण दिशा यम और पितरों की दिशा है। वहां दीपक जलाने से उन्हें मोक्ष की प्राप्ति होती है। इसके अलावा गायों को प्रतिदिन चारा खिलाने की और पीपल के पेड़ को पानी देने की प्रथा भी देखी जाती है। इन दिनों लोग शिव मंदिर में पितरों की शांति के लिए दूध चढ़ाते हैं।

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श्राद्ध का सबसे सरल उपाय: श्रीमद् भगवद गीता!
जब श्राद्ध में कुछ और न हो तो पितरों की मुक्ति का सबसे आसान उपाय है ‘श्रीमद भगवद गीता’! अगर पितरों को याद करके भगवद गीता का पाठ किया जाए तो भी उन्हें मोक्ष मिलता है। भगवद गीता में विशेष कर पंद्रहवें अध्याय ‘पुरुषोत्तम योग’ या बारहवें अध्याय ‘भक्ति योग’ का पाठ करने का विशेष महत्व है। श्राद्ध पक्ष में गीता का पाठ करने मात्र से भी पितरों को सद्गति मिलती है।
रामायण और महाभारत में श्राद्ध की कथा!
श्राद्ध का महत्व और महिमा युगों-युगों से चली आ रही है। श्राद्ध का विधान सबसे पहले ब्रह्मा ने बताया था। श्राद्ध से जुड़ी कथाएं हमारे पुराणों में भी मिलती हैं। रामायण की बात करें तो भगवान राम ने अपने पिता राजा दशरथ का श्राद्ध किया था। वह कहानी प्रचलित है।
महाभारत के अनुशासन पर्व में ऋषि निमि ने ऋषि अत्रि की सलाह के अनुसार श्राद्ध किया था। दूसरी ओर, कुरुक्षेत्र के युद्ध के दौरान एक क्षण ऐसा आया था जब माता कुंता ने व्यथित हो कर पांडवों को कर्ण के बारे में सच्चाई बताई थी। तब पांडवों को पहली बात पता चला की कर्ण कोई पराया नहीं बल्कि अपना ही बड़ा भाई है। इस लिए जब युद्ध के अंत में, भगवान कृष्ण ने युधिष्ठिर से पांडवों और कौरवों की ओर से सभी मृतकों का श्राद्ध करने के लिए कहा तब उन्होंने कर्ण का श्राद्ध भी किया था।
श्राद्ध पक्ष 17 सितंबर भाद्रपद पूर्णिमा से प्रारंभ हो रहा है।
ऋषि श्रद्धा 17 सितंबर को भाद्रपद पूर्णिमा को है।
भाद्रपद की अमावस्या को ‘सर्व पितृ अमास’ कहती है।
सर्व पितृ अमावस्या 2 अक्टूबर को है।
मान्यता के अनुसार, श्राद्ध पक्ष में पूर्वज गाय, कौवे और कुत्ते के रूप में घर आते हैं। इसलिए हर परिवार में पहले उन्हें भोजन परोसने की प्रथा है। कौओं के लिए दक्षिण दिशा में विशेष ‘कागवास’ दिया जाता है। गाय की भी पूजा कर उन्हे थाली पिरोसी जाती है। इसके अलावा कुत्तों के लिए भी भोजन बनाया जाता है।
जब किसी को पूर्वज की मृत्यु तिथि के बारे में पता न हो या जब वह जाने-अनजाने में किसी पूर्वज को श्राद्ध देना चाहता हो तब भाद्रपद की अमावस्या को श्राद्ध कर सकते हैं। इसलिए उसे सर्व पितृ अमावस्या भी कहा जाता है।
श्राद्ध को भोजन में दूध और खीर-पूरी बनाने का विशेष महत्व है।
पुरुषों को धोती, खेस या अन्य कपड़े दान किए जाते हैं और महिलाओं या युवतियों को साड़ी, चुनर, चूड़ी और शृंगार के साथ आभूषण दान दिए जाते हैं।
जब श्राद्ध में कुछ और न हो तो पितरों की मुक्ति का सबसे आसान उपाय है ‘श्रीमद भगवद गीता’! अगर पितरों को याद करके भगवद गीता का पाठ किया जाए तो भी उन्हें मोक्ष मिलता है। भगवद गीता में विशेष कर पंद्रहवें अध्याय ‘पुरुषोत्तम योग’ या बारहवें अध्याय ‘भक्ति योग’ का पाठ करने का विशेष महत्व है। श्राद्ध पक्ष में गीता का पाठ करने मात्र से भी पितरों को सद्गति मिलती है।
श्राद्ध पक्ष में प्रतिदिन दक्षिण दिशा या पनियार में दीपक जलाने का भी विशेष महत्व है। क्योंकि दक्षिण दिशा यम और पितरों की दिशा है। वहां दीपक जलाने से उन्हें मोक्ष की प्राप्ति होती है। इसके अलावा गायों को प्रतिदिन चारा खिलाने की और पीपल के पेड़ को पानी देने की प्रथा भी देखी जाती है। इन दिनों लोग शिव मंदिर में पितरों की शांति के लिए दूध चढ़ाते हैं।