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Poem of the Day – छाँव जैसे पापा | किस्से कलम के

Column: कॉलम: किस्से कलम के | Writer: डॉ. कृपेश ठक्कर

“किस्से कलम के” की इस कड़ी में, प्रस्तुत है डॉ. कृपेश की प्रभावशाली कविता “छाँव जैसे पापा”, जो पिताओं के संघर्ष और कठिन परिश्रम को समर्पित है। यह कविता पिता-पुत्र के अनमोल रिश्ते को प्रतिबिंबित करती है और पिता की भूमिका को उजागर करती है, जो अपने बच्चों के लिए छाया की तरह है। कविता में पिता की अथक मेहनत, समर्पण और प्यार का वर्णन किया गया है, जो अपने बच्चों को सुरक्षित और सम्मानित महसूस कराने के लिए हर संभव प्रयास करते हैं। “छाँव जैसे पापा” पिता-पुत्र के अटूट बंधन को प्रतिष्ठित करती है और पिता के महत्व को उजागर करती है, जो अपने बच्चों के जीवन में एक अमूल्य उपस्थिति हैं। यह कविता पिता के प्यार और दयालुता को सराहना देती है और उन्हें उनके योगदान के लिए सम्मानित करती है।


Poem of the Day – छाँव जैसे पापा

गर्मी की तपती धूप में,
छाँव जैसे पापा;
शहर की ऊँची इमारतों में,
गाँव जैसे पापा;

मेरे ख्वाबों को देने,
ऊँची उड़ाने,
दफ्तर की सीढियों पे घिसते,
पाँव जैसे पापा;
गर्मी की तपती धूप में, छाँव जैसे पापा;

चंद सिक्को में समेटे,
सारे घरकी खुशियाँ,
तूफान में अकेले लडती,
एक नाव जैसे पापा;
गर्मी की तपती धूप में, छाँव जैसे पापा;

खुदके होने का न जिसको,
एहसास जताना आये,
जीवन के गीत में खामोश,
ठहराव जैसे पापा;
गर्मी की तपती धूप में, छाँव जैसे पापा;