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रक्षाबंधन का त्योहार क्यों मनाया जाता है? | जानिये रक्षाबंधन की कथा, महत्त्व और पौराणिक मान्यताएं | पर्व की पाठशाला

Column: पर्व की पाठशाला | Writer: डॉ. कृपेश ठक्कर

दुनिया के किसी भी कोने में रहने वाले हिंदुओं को एक सूत्र से बाँधने वाला त्योहार है ‘रक्षाबंधन’! श्रावण मास की पूर्णिमा को मनाया जाने वाला यह पर्व ‘राखी का त्योहार’ के नाम से भी जाना जाता है। भाई- बहन के विशिष्ट प्रेम के प्रतीक समान यह त्यौहार प्राचीन काल से मनाया जाता रहा है। चाहे वह देवराज इंद्र और इंद्राणी हों या स्वयं भगवान कृष्ण और द्रौपदी! कच्चे धागे से अटूट रक्षा का वचन निभाने की यह प्रथा आज भी कायम है। इस रक्षा सूत्र ने इंद्र को युद्ध में विजय दिलाई और द्रौपदी के सम्मान की भी रक्षा की। साथ ही भारत के इतिहास में ऐसे कई किस्से हैं। जिसमें राज्य की रक्षा के लिए राखी के धागे ने प्रमुख भूमिका निभाई हो। दिलचस्प बात यह है कि इस त्यौहार की कथा का मूल पर्व की पाठशाला में पहले की गई कहानी से जुड़ा हुआ है। जिसकी हम आगे बात करेंगे।

चाहे वह कोई भी प्रांत हो, राज्य हो या हो कोई भी देश; हमारी संस्कृति का पालन करने वाले लोग सुबह जल्दी उठकर, स्नान करके, पूजा करके और मुहूर्त के अनुसार, परिवार की रक्षा के लिए सबसे पहले अपने भगवान को राखी बाँधकर रक्षाबंधन मनाते हैं। घर में, भाई के लिए मिठाइयाँ और व्यंजन तैयार किए जाते हैं, रिश्तेदारों से घर भरा हुआ सा रहता है, हर कोई अपनी पसंद के नए कपड़े पहन कर, नए उपहारों के साथ यह त्योहार मनाता है। रक्षाबंधन में बहन भाई के माथे पर तिलक लगाती है। कलाई पर रक्षा सूत्र बाँधती है और पसंदीदा मिठाई खिलाकर भाई का  मुँह मीठा कराती है। फिर भाई बहन के पैर छू कर आशीर्वाद लेता है और बहन को जो उपहार पसंद हो देता है। यह तस्वीर हर घर और परिवार में देखी जाती है। साथ ही इस त्योहार में देश, काल या परिस्थिति की कोई सीमा नहीं होती। भले ही कोई बहन या भाई एक दूसरे से बहुत दूर हों, उनका प्यार आज भी एक लिफाफे में पैक हो कर कूरियर के माध्यम से एक दूसरे तक पहुँचता है। अगर बहन कवर में भाई के लिए अनमोल राखी भेजती है; तो भई भी हमेशा अपनी बहन के लिए उसका पसंदीदा उपहार भिजवाता है। विदेश में रहने वाले रिश्तेदार वीडियो कॉल के जरिए एक दूजे से जुड़कर इस पर्व को मनाते हैं।

राखी की दिल छू लेने वाली घटना तब घटित होती है जब अपने परिवार से दूर रहने वाले सिपाहियों की रक्षा के लिए बहनें देशभक्ति की मिसाल बनकर बिना किसी रिश्ते के उसे राखी बाँधने के लिए पहुँच जाती हैं। रक्षाबंधन के त्योहार के रंग में सिर्फ घर ही नहीं बल्कि सड़कें और बाजार भी रंगे हुए होते हैं। आमतौर पर पंद्रह से बीस दिन पहले से ही दुकानें तरह तरह की राखियों से सजी होती हैं। साथ ही, कपड़ों की दुकाने, गिफ्ट शॉप और मिठाई की दुकानों के साथ-साथ शॉपिंग मॉल में भी इस त्योहार की थीम पर सजावट की जाती है! रक्षाबंधन एक ऐसा त्यौहार है जिसकी सभी को प्रतीक्षा रहती है। हालाँकि, इस उत्सव की मूल कहानी भी प्रतीक्षा से ही शुरू हुई थी।

यह उस समय की बात है जब चातुर्मास के दौरान भगवान विष्णु दानवराज बलि के साथ पाताल लोक में गये हुए थे। उस कहानी पर हमने पहले ‘पर्व की पाठशाला’ में चर्चा की थी। तब माता लक्ष्मी विष्णु जी के विरह से व्यथित थी। साथ ही उनकी अनुपस्थिति में सृष्टि की संचालन व्यवस्था भी देखनी थी। भगवान विष्णु की प्रतीक्षा में माता लक्ष्मी को परेशान देखकर देवर्षि नारद उनके पास गए और भगवान विष्णु को वापस लाने की कामना की। ऐसे में माता के पास एक ही उपाय था जिससे वह अपने भगवान विष्णु को वापस ला सकें। ईसके लिए श्रावण मास की पूर्णिमा को माता लक्ष्मी स्वयं पाताल लोक गईं। बलिराज ने पूरी श्रद्धा के साथ देवी का स्वागत किया और प्रणाम किया। वह बलिराजा की भक्ति और समर्पण से प्रसन्न थे। माता लक्ष्मी का कोई भाई नहीं था। इसलिए माताने बलिराजा को अपना भाई बनाने का प्रस्ताव रखा। बलि राजा को भाई होने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। माता ने विधिपूर्वक बलिराज की कलाई पर रक्षा सूत्र बांधा।

जब बलिराज ने एक भाई के रूप में अपनी बहन को उपहार देने की इच्छा व्यक्त की, तो माँ लक्ष्मी ने उपहार में अपने स्वामी भगवान विष्णु को वापस माँग लिया। भाई बलि राजा ने अपना वचन निभाया। उन्होंने भगवान विष्णु से प्रत्येक वर्ष के लिए केवल चार महीने मांगकर भाई होने का कर्तव्य निभाया। इसीलिए जब बहन भाई को राखी बाँधती है तो उस दिव्य घटना की महिमा का स्मरण करते हुए इस श्लोक का उच्चार करते हुए सनातन संस्कृति की परंपरा निभाती है। “येनबद्धो बलिराजा दानवेन्द्रो महाबल:, तेन त्वां अनुबद्धामी रक्षं अचल: अचल:।”

अर्थात जिस पवित्र बंधन से शक्तिशाली बलिराजा भी बंधे हैं। उसी पवित्र बंधन से मैं तुम्हें बाँधती हूँ। ऐसे ही अचल रह कर मेरी रक्षा करना। इसी दिव्य भावना का प्रतीक है बहन द्वारा भाई की कलाई पर बाँधी जाने वाली राखी, जिसके बंधन में देवता भी बँध जाते हैं; ऐसी है ‘रक्षाबंधन’ पर्व की महिमा!


Raksha Bandhan Theme Song

BROTHER SISTER SONG FOR RAKSHA BANDHAN
रक्षाबंधन का दूसरा नाम क्या है?

कुछ राज्यों में रक्षा बंधन को नारियल पूर्णिमा कहा जाता है। श्रावण पूर्णिमा को उत्तर भारत में कजरी पूर्णिमा और दक्षिण भारत में अभित्तम के नाम से जाना जाता है।

रक्षाबंधन क्यों मनाया जाता है?

रक्षाबंधन हिंदुओं का पवित्र त्योहार माना जाता है। भाई-बहन के विशेष प्रेम का प्रतीक यह त्यौहार प्राचीन काल से मनाया जाता रहा है। चाहे वह देवराज इंद्र और इंद्राणी हों या स्वयं भगवान कृष्ण और द्रौपदी! कच्चे धागे से अटूट रक्षा का वचन निभाने की प्रथा आज भी कायम है। उस रक्षा पंक्ति ने इंद्र को युद्ध में विजय दिलाई और द्रौपदी के सम्मान की भी रक्षा की।

रक्षा बंधन कब है?

इस साल रक्षाबंधन का त्योहार 19 अगस्त 2024 दिन सोमवार को देशभर में मनाया जाएगा.

रक्षा बंधन पूनम कब है?

पंचांग के अनुसार इस वर्ष श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि 19 अगस्त सोमवार को है. फिर रक्षाबंधन का त्योहार उदयातिथि के आधार पर सोमवार 19 अगस्त को मनाया जाएगा।

राखी बांधने का मुहूर्त कब है?

19 अगस्त को रक्षा बंधन का शुभ समय दोपहर 1:30 बजे से रात 9:08 बजे तक है।