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मंगला गौरी व्रत क्यों किया जाता है? | मंगला गौरी व्रत की कथा, महिमा, पूजन विधि और मुहूर्त | पर्व की पाठशाला

Column: पर्व की पाठशाला | Writer: डॉ. कृपेश ठक्कर

‘मंगला गौरी व्रत’ पूजा, आराधना और व्रत के माध्यम से माँ गौरी को प्रसन्न करने की परंपरा है। खासकर हिन्दू धर्म में इस व्रत कर खास तौर पर लड़कियों और महिलाओं के लिए विशेष महत्त्व है। इस साल में यह व्रत सावन महीने के पहले मंगलवार 23 जुलाई, से शुरू हुआ है और हर मंगलवार को रखा जाएगा। इस व्रत में माता गौरी और महादेव की पूजा की जाती है। ‘पर्व की पाठशाला’ में हम जानेंगे इस व्रत से जुड़ी रोचक बातें और देवी गौरी की कथा! मंगला गौरी व्रत करने से कुँवारी लड़कियों को मनचाहा साथी मिलता है और विवाहित महिलाओं को सुखी, समृद्ध गृहस्थ जीवन मिलता है। नव परिणित महिलाएँ अपने पति की लंबी उम्र के लिए मंगला गौरी व्रत जरूर करती हैं। जिन्हें विवाह करने में समस्या आती हो या जिन्हें मंगल की दशा हो उन महिलाओं के लिए भी मंगला गौरी व्रत शुभ फलदायी होता है।

मंगला गौरी व्रत से कन्या को मिले प्रिय वर!

आमतौर पर लड़कियाँ समझदार होते ही मनचाहा पति पाने के लिए यह व्रत रखना शुरू कर देती हैं। वही विवाहित स्त्रियों में इस व्रत के लिए विशेष आकर्षण रहता है। व्रत का संकल्प लेने वाली महिलाएँ सुबह जल्दी उठती हैं, स्नान करती हैं और सुंदर और साफ कपड़े पहनती हैं। इसके बाद वह घर पर या स्थानीय मंदिर में गौरी माता की पूजा करने का संकल्प करती हैं। माता गौरी और महादेव की पूजा कर के माता रानी को लाल चुनर और सुहाग की चीजें चढ़ाने का विशेष महत्त्व होता है। इसके बाद पूरा दिन फलाहार या उपवास रखा जाता है। माता गौरी की आरती कर खीर का प्रसाद किया जाता है। इसके उपरांत मंगला गौरी के दिन ब्राह्मणों को भोजन कराने से भी माता गौरी और महादेव प्रसन्न होते हैं ऐसा माना जाता है। इस प्रकार मंगला गौरी का व्रत करने से विशेष फल की प्राप्ति होती है। जिस प्रकार माता पार्वती को महादेव मिले उसी प्रकार व्रत करने से उन्हें भी उनका प्रिय वर मिलेगा ऐसा लड़कियों का पूर्ण विश्वास रहता है। महादेव के पाने के लिए माता गौरी ने जिस प्रकार तपस्या की वह कहानी बड़ी रोचक है।

माता पार्वती ने की महादेव के लिए तपस्या!

पौराणिक कथाओं के अनुसार, आदिशक्ति ने स्वयं पर्वतराज हिमालय की पुत्री के रूप में जन्म लिया था और पर्वत की पुत्री ‘पार्वती’ के नाम से जानी गईं। माता पार्वती के मन में शुरू से ही भगवान शिव के प्रति भक्ति और प्रेम था। भगवान शिव को प्राप्त करने के लिए वह अपने माता- पिता की आज्ञा लेकर हिमालय पर्वत पर चले गए और वहाँ कठोर तपस्या करने लगे। वहाँ वे शिवलिंग की विधिवत् पूजा- अर्चना और ध्यान करने लगे। धीरे- धीरे कंद मूल और फल खाने से शुरुआत करने के बाद, उन्होंने श्रावण के महीने में पूर्ण उपवास रखा। अन्न- जल त्यागकर, एक भी फल या पत्ता (पत्ती) न खाकर उन्होंने स्वयं को कठोर तपस्या में लीन कर लिया। इसीलिए उन्हें ‘अपर्णा’ के नाम से भी जाना जाता है। कठोर तपस्या के फलस्वरूप उनका शरीर क्षीण और काला हो गया। लेकिन महादेव को पाने का उनका संकल्प कमजोर नहीं हुआ। तपस्या के दौरान भगवान शिव ने उनकी बहुत परीक्षा ली।

इस लिए वह कहलाई ‘महागौरी’!

कहा जाता है कि एक दिन नदी में नहाते समय उन्होंने एक मगरमच्छ को एक बच्चे का शिकार करते देखा. उसने मगरमच्छ से छोटे बच्चे को छोड़ देने का अनुरोध किया। मगरमच्छ ने कहा कि वह व्रत के कारण दिन के उस समय में जो भोजन मिले ग्रहण करता है और फिर उपवास और तपस्या मे लग जाता है। तब माता पार्वती ने बच्चे की बचाने के लिए मगरमच्छ की मदद करने का वचन दिया। तब मगरमच्छ ने बच्चे को छोड़ दिया और बदले में पार्वती से अपनी अब तक की तपस्या का फल माँगा। माता पार्वती ने बिना एक पल भी सोचे तुरंत अपनी तपस्या का पूरा फल मगरमच्छ को दे दिया। तब मगरमच्छ का  रूप छोड़ महादेव स्वयं प्रकट हुए। पार्वती महादेव के दर्शन पाकर धन्य हो गईं। माता पार्वती ने अनजाने में ही तपस्या का फल शिव को अर्पित कर दिया था। पार्वती की भक्ति, प्रेम, दया, परोपकार और मंगलमयता देखकर भगवान शिव भी प्रसन्न हुए। तप के कारण क्षीण हो चुकी माता पार्वती को भगवान ने ‘गौर वर्ण’ का वरदान दिया। इसलिए वे फिर से सुंदर और रूपवान बन गईं। तभी से उन्हें ‘महागौरी’ के नाम से जाना जाने लगा। इतना ही नहीं बल्कि भगवान शिव ने देवी पार्वती के प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया और उनसे विवाह करने के लिए सहमत हो गए। आगे की कहानी से सभी परिचित हैं! माता गौरी की तपस्या की महिमा ने सभी लड़कियों और महिलाओं को प्रेरित किया है। इसीलिए मंगला गौरी व्रत आज महिलाओं के लिए एक विशेष परंपरा बन गया है।


मंगला गौरी व्रत रखने से क्या होता है?

‘मंगला गौरी व्रत’ पूजा, आराधना और व्रत के माध्यम से माँ गौरी को प्रसन्न करने की परंपरा है। मंगला गौरी व्रत करने से कुँवारी लड़कियों को मनचाहा साथी मिलता है और विवाहित महिलाओं को सुखी, समृद्ध गृहस्थ जीवन मिलता है। नव परिणित महिलाएँ अपने पति की लंबी उम्र के लिए मंगला गौरी व्रत जरूर करती हैं। जिन्हें विवाह करने में समस्या आती हो या जिन्हें मंगल की दशा हो उन महिलाओं के लिए भी मंगला गौरी व्रत शुभ फलदायी होता है।

मंगला गौरी के व्रत में क्या खा सकते हैं?

व्रत के दौरान पूरा दिन फलाहार या उपवास रखा जाता है। माता गौरी की आरती कर खीर का प्रसाद किया जाता है। भोजन में नमक का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए।

मंगला गौरी व्रत कब किया जाता है?

2024 में मंगला गौरी व्रत की शुरुआत मंगलवार 23 जुलाई से होगी। पहला मंगलागौरी व्रत 23 जुलाई को रखा जाएगा। इस बार कुल 4 मंगला गौरी व्रत होंगे।

गौरी व्रत की पूजा कैसे की जाती है?

महिलाएँ सुबह जल्दी उठती हैं, स्नान करती हैं और सुंदर और साफ कपड़े पहनती हैं। इसके बाद वह घर पर या स्थानीय मंदिर में गौरी माता की पूजा करने का संकल्प करती हैं। माता गौरी और महादेव की पूजा कर के माता रानी को लाल चुनर और सुहाग की चीजें चढ़ाने का विशेष महत्त्व होता है।