जगन्नाथ पुरी की रथयात्रा का इतिहास, महिमा और उससे जुड़ी कथा। – पर्व की पाठशाला
Column: कॉलम: पर्व की पाठशाला | Writer: डॉ. कृपेश ठक्कर
आषाढ़ माह की शुक्ल पक्ष की दूज को मनाया जाता है रथ त्यौहार, जिसे सब रथयात्रा के नाम से जानते हैं। यह त्यौहार सभी हिन्दू भक्तों के लिए बहुमूल्य उत्सव है, क्योंकि इस दीन जगत के नाथ यानि स्वयं भगवान जगन्नाथ अपने भक्तों से मिलने मंदिर से बाहर आते हैं। कहा जाता है की अगर भक्त दो कदम चले तो भगवान दस कदम चलकर भक्त के पास आते हैं। इसी भाव का प्रतीक है यह रथयात्रा! पर्व की पाठशाला अर्थात त्यौहारों की पाठशाला में आइए जानते हैं, इस रथयात्रा से जुड़े जाने अनजाने किस्से और भगवान जगन्नाथ के विशिष्ट स्वरूप की कहानी।
उड़ीसा की जगन्नाथ पुरी की रथ यात्रा भारत की प्रमुख रथयात्रा मानी जाती है। भगवान जगन्नाथ, भाई बलराम और बहन सुभद्रा को साल भर वर्ष पूजने के बाद आषाढ़ माह की दृतिया को मंदिर से बाहर लाया जाता है। भगवान जगन्नाथ को नंदीघोष बलराम को ताल ध्वज और देवी सुभद्रा को पद्माध्वज नाम के भव्य रथ में बैठाया जाता है। यह काफी बड़े पहियों वाले और पूरे लकड़ी के बने होते हैं। जिसे सुंदर रूप से सजाया जाता है और हर वर्ष नए रथ बनाए जाते हैं। ‘बड़ा डंडा’ के नाम से जानी जाने वाली पूरी की मुख्य बाजार से होते हुए इन रथों को ‘गुंडिया मंदिर’ ले जाया जाता है। जहां जनता को उनके दुर्लभ दर्शन करने का मौका मिलता है और बड़े-बड़े रसिया से बंधे हुए उसे रथ को खींचकर ले जाने का महा पुण्य भी नसीब होता है। गुंडिया मंदिर में नौ दिनों तक रहने के बाद तीनों मूर्तियां को फिर से उन भव्य रथों में बैठकर श्री मंदिर वापस लाया जाता है। जिसे ‘बहुडा यात्रा’ कहते हैं। वापस आते वक्त तीनों मूर्तियां मौसीमा मंदिर में विराम करती हैं। जहां सभी भक्तों को ‘पोडा पीठा’ का प्रसाद मिलता है और फिर रथ यात्रा आगे बढ़ती है। इसी तरह हर वर्ष भगवान श्री कृष्ण, बलराम और देवी सुभद्रा की जनकपुर से जगन्नाथ पुरी तक की यह भव्य रथयात्रा उनके भक्तों द्वारा संपन्न होती है।

रथ यात्रा सभी के लिए आकर्षण का केंद्र रहती है। इसके अलावा अलग-अलग राज्यों में और अलग-अलग शहरों में भी रथयात्रा का आयोजन होता है। अगर गुजरात की बात करें तो अहमदाबाद शहर में होने वाली जगन्नाथ मंदिर से निकलती हुई रथयात्रा गुजरात की सबसे बड़ी रथ यात्रा होती है। जिसमें हजारों लोग शामिल होते हैं। सुंदर श्रृंगार, मनोहर मुख और बड़ी-बड़ी आँखें एवं छोटे-छोटे हाथ पैर; रथयात्रा की महिमा जितनी विशिष्ट है, उतनी ही विशिष्ट है भगवान के ऐसे रूप के पीछे की कहानी।
जगन्नाथ रथ यात्रा की कहानी क्या है?

यह उस समय की बात है। जब भगवान कृष्ण की सभी रानियां बलराम के माता रोहिणी को मिलने जाती है और फरियाद करती है कि कृष्ण के मुख में सदैव ही राधा का नाम क्यों रहता है? तब माता रोहिणी ने कहा “अगर कृष्ण और बलराम यहां ना हो, तब ही मैं यह कथा कहूंगी!” इसलिए सभी ने कृष्ण की छोटी बहन सुभद्रा को कक्ष के द्वार पर निगरानी करने के लिए कहा। जिससे कथा के दौरान कृष्ण और बलराम कक्ष में प्रवेश न कर सके। सुभद्रा ने द्वार बंद तो किये किंतु वह अपनी जिज्ञासा को रोक नहीं पाई और द्वार पर कान रखकर उनकी बातें सुनाने लगी। कृष्ण और राधा के परम प्रेम और भक्ति की पराकाष्ठा की वह कथा सुन, सुभद्रा चकित हो गई! तभी भगवान कृष्ण और बलराम वहां आए और उन्होंने सुभद्रा को ऐसे देखा। वह भी द्वार पर कान रखकर अंदर होने वाला संवाद सुनने लगे। परिणाम के तहत कृष्ण और बलराम खुद भी भक्त और भगवान की वह महिमा सुन चकित हुए।
उस कथा से विस्मित होकर उन तीनों की आँखें एकदम बड़ी हो गई और हाथ पैर छोटे होने लगे। विहार करते- करते देवर्षि नारद भी वहाँ आ पहुँचे और यह अद्भुत दृश्य, अद्भुत रूप, और अद्भुत लीला देखकर कृतज्ञ हुए। उन्होंने हाथ जोड़कर भगवान से प्रार्थना की “हे प्रभु जो अलौकिक रूप मैंने देखा, वह आप पूरी दुनिया को दिखाइए भगवान ने उनसे त्रेता युग में संसार को इस रूप का दर्शन कराने का वचन दिया। इसी लिए आज हम सभी को रथ यात्रा के द्वारा इस दुर्लभ और अलौकिक रूप के दर्शन करने का सौभाग्य मिल रहा है।
जगन्नाथ रथ यात्रा FAQ
आषाढ़ माह की शुक्ल पक्ष की दूज को मनाया जाता है रथ त्योहार, जिसे सब रथयात्रा के नाम से जानते हैं।
रथयात्रा उड़ीसा के जगन्नाथ पुरी में मनाई जाती है।
रथयात्रा ‘बड़ा डंडा’ के नाम से जानी जाने वाली जगन्नाथ पूरी की मुख्य बाजार से शुरू होते हुए ‘गुंडिया मंदिर’ तक जाती है।
जगन्नाथ पूरी की रथयात्रा के दौरान गुंडिया मंदिर में नौ दिनों तक रहने के बाद तीनों मूर्तियां को फिर से उन भव्य रथों में बैठकर श्री मंदिर वापस लाया जाता है। जिसे ‘बहुडा यात्रा’ कहते हैं।
भगवान जगन्नाथ के भव्य रथ का नाम नंदीघोष है। बलराम के रथ का नाम ताल ध्वज और देवी सुभद्रा के रथ का नाम पद्माध्वज है।