शारदीय नवरात्र प्रारंभ | नवरात्रि पूजा, महत्व, महिमा और कहानी | पर्व की पाठशाला
Column: पर्व की पाठशाला | Writer: डॉ. कृपेश ठक्कर

नवरात्रि भारतीय संस्कृति के प्रमुख त्योहारों में से एक है। संस्कृति और धर्म का उत्सव मनाने वाला यह त्योहार आमतौर पर साल में चार बार आता है। चैत्र नवरात्रि, शारदीय नवरात्रि और दो गुप्त नवरात्रि। आज ‘पर्व की पाठशाला’ में हम शारदीय नवरात्रि के बारे में जानेंगे। पितृपक्ष की समाप्ति के तुरंत बाद अश्विन मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि यानी इस वर्ष 3 अक्टूबर से प्रारंभ हो रहा है। जो 11 अक्टूबर को देवी दुर्गा के विभिन्न रूपों की पूजा के साथ नौ दिनों तक मनाया जाएगा और 12 अक्टूबर को दसवें दिन ‘विजयदशमी’ यानी ‘दशहरा’ के रूप में मनाया जाएगा।

कैसे मनाई जाती है नवरात्रि?
भारत के अलग-अलग प्रांतों में नवरात्रि अलग-अलग तरीके से मनाई जाती है। जिसमें बंगाल, गोवा और केरल जैसे राज्यों में दुर्गा माता की बड़ी सुंदर मूर्ति स्थापित की जाती है और महिषासुर मर्दिनी के विशेष रूप की पूजा की जाती है। साथ ही रावण के पुतले के दहन के साथ ‘विजयदशमी’ भी मनाई जाती है। वहीं गुजरात में भक्ति भाव से गरबा खेलने का भी उतना ही महत्व है जितना कि नवरात्रि में मां की आराधना का। गरबा के साथ नवरात्रि मनाने की इस परंपरा को विदेशों में रहने वाले गुजराती लोगों ने भी कायम रखा है।
नवरात्रि के पहले दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करके, साफ कपड़े पहनकर पूरे घर की साफ-सफाई करके घर के मुख्य दरवाजे पर आम के पत्ते का तोरण बांधा जाता है। घर के मंदिर पर गंगा जल छिड़का जाता है। उसके बाद कंकू, लाल चंदन, लाल चुनर और श्रृंगार के साथ बाजोठ पर माताजी की मूर्ति, छवि या प्रतीक को बीठा कर के स्नान, अभिषेक और पूजा की जाती है।
कैसे करें कलश स्थापना?
कलश स्थापन या घटस्थापना नवरात्रि के पहले दिन होता है।माना जाता है की नवरात्रि के समय ब्रह्मांड में उपस्थित शक्तित्त्व का घट अर्थात कलश में आह्वान होता है। शक्तितत्व के कारण वास्तु दोष नष्ट हो है। कलश की स्थापना उत्तर या उत्तर-पूर्व दिशा में की जाती है। जिसके लिए मिट्टी के बर्तन में जौ या गेहूं बोया जाते हैं और उसके ऊपर कलश को शुद्ध जल और गंगा जल भरकर रखा जाता है। उस कलश में अक्षत, दूर्वा, सुपारी और सिक्का डाला जाता है और कलश को कलावा बाँधा जाता है। उसमें पाँच आम के पत्ते रख कर नारियल रखा जाता है। कलश को कलावा बांध दिया जाता है और उस पर सूखा नारियल रखते है। नारियल को भी कलावा बांधकर रखा जाता है।
हिन्दू धर्म में कलश को त्रिगुणात्मक शक्ति माना जाता है। कहते हैं कि इसमें ब्रह्मा विष्णु और शिव के अतिरिक्त सभी देवी देवताओं का वास होता है, इसीलिए नवरात्रि की पूजा से पहले कलश स्थापना की जाती है। ऐसा करने से सभी देवी देवता उस ऊर्जा और व्रत के साक्षी बन जाते हैं।
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जानिए गरबा के बारे में ये बात:
कलश स्थापना के साथ गरबा और अखंड ज्योत रखना भी विशेष शुभ फल देने वाला माना जाता है। मिट्टी से बना सुंदर रंग-बिरंगा किनारों वाला घड़ा ‘गर्भदीप’ है जिसे ‘गारबा’ भी कहा जाता है। गरबा पृथ्वी और हमारे शरीर का प्रतीक है। इसके गर्भ यानि मध्य भाग में रखा दीपक पृथ्वी के गर्भ में स्थित शक्ति तत्व और हमारे भीतर की चेतना का प्रतीक है। नवरात्रि के दौरान हर कोई अपने घर पर गरबा स्थापित करता है। एक मिट्टी का गरबा एक छोटे बाजोठ पर रखा जाता है। जिसे सुंदर रंगों से सजा कर अंदर मूंग का ढेर लगाया जाता है। इसके अंदर एक दीपक भी रखा जाता है।
इसके अलावा सिर पर गरबा रखकर रास खेलने का भी चलन है। गुजरात में कन्याएं सिर पर गरबा लेकर घर-घर गीत गाने जाती हैं। लोग इन्हें माता का रूप मानकर दान-दक्षिणा देते हैं।

कन्या पूजा कैसे करें?
हमारे शास्त्रों में नवरात्रि के नौ दिनों में आठवें और नौवें दिन कुमारिका पूजन करने की बड़ी महिमा बताई है। सनातन धर्म में कुमारिका को देवी का साक्षात स्वरूप माना जाता है। इसलिए नवरात्रि में माँ को विशेष भक्ति प्रदान करने के लिए कंकू, अक्षत और आरती की थाली से कन्या की पूजा की जाती है। उनके दाहिने पैर का को कंकू और अक्षत से पूजा जाता है और ‘पद प्रक्षालन’ यानी पैर धोए जाते हैं। उन्हें पसंदीदा भोजन दिया जाता है और यथाशक्ति दान व दक्षिणा दी जाती है। जिसमें आमतौर पर चूड़ी, बिंदी, कंकू, चूनर दिए जाते हैं। इसके अलावा कपड़े और तदनुरूप आभूषण उपहार में देने की भी भाव रहता है। नवरात्रि में कन्या पूजन करने से माता विशेष रूप से प्रसन्न होती हैं।

गरबा और डांडिया रास!
इन नौ दिनों में प्रतिदिन माता की पूजा, आरती और प्रसाद किया जाता है। पूरा परिवार एक साथ आरती करता है। इसके अलावा ‘दुर्गा सप्तशती’, ‘श्री देवी सूक्त’ और ‘शकरोदय स्तुति’ गाने की भी विशेष महत्व है। घर के अलावा चौक, सोसायटी या खुले मैदान में स्थानिक तौर पर माता की चौकी होती हैं जहा सभी साथ मिलकर माता की आराधना करते हैं। वहीं गुजरात में और देश विदेश में रहते गुजराती समुदाय में छोटे और बड़े पैमाने पर गरबा और डांडियारास के कार्यक्रम में एकत्रित होते हैं। समूह में आरती कर प्रसाद और गरबा खेलने का आनंद लिया जाता है। गरबा और डांडिया रास माता के प्रति भक्ति की अभिव्यक्ति है और इस अभिव्यक्ति में कृष्ण और गोपियों की तरह भक्ति का भाव है।

नवरात्रि आरती: जय आद्याशक्ति

नवरात्रि की कथा: महिषासुर वध
नवरात्रि के संबंध में विभिन्न पुराणों में विभिन्न कथाएँ मिलती हैं। एक प्रचलित कथा के अनुसार महिषासुर नाम का एक राक्षस था। कठोर तपस्या के फलस्वरूप उसे यह वरदान मिला कि उसकी मृत्यु किसी भी पुरुष जाति से नहीं हो सकती। वरदान प्राप्त करने के बाद वह घमंड से चूर हो गया और उसने तीनों लोकों में हाहाकार मचा दिया। उसने देवताओं को परास्त करके ऋषियों के आश्रम को भी नष्ट कर दिया। उसके बाद महिषासुर ने विष्णु लोक और कैलास पर भी विजय प्राप्त करने का निश्चय किया। यह जानकर देवताओं ने भगवान शिव और विष्णु से मदद मांगी। उन्होंने सभी देवों को माता आदिशक्ति की आराधना करने के लिए कहा। प्रसन्न होकर माता ने उनकी समस्या का समाधान करने के लिए स्वयं दुर्गा रूप धारण किया। माता ने अपनी अष्टभुजाओं में अस्त्र-शस्त्र धरण किए। तथा अपार शक्ति से नौ दिनों तक महिषासुर से युद्ध किया। दसवें दिन वध हुआ। इसलिए देवी को ‘महिषासुरमर्दिनी’ के नाम से भी जाना जाता है। तब सभी देवताओं और तीनों लोकों ने उत्सव मनाया, जिसे हम आज भी दशहरा के रूप में मनाते हैं।
माँ के नौ रूपों की आराधना!
नवरात्रि का महत्व, महिमा, इसकी विधियां और इसकी कथाएं हमारे विभिन्न पुराणों में वर्णित हैं। नवरात्रि जीवन में सुख-समृद्धि लाती है और नकारात्मक तत्वों को दूर कर विजय दिलाती है। आदिशक्ति की आराधना मनोवांछित फल देने वाली है। सभी भक्तों के कष्ट दूर करने वाली है। नवरात्रि के पहले दिन से अनुक्रम से माता शैलपुत्री, माता ब्रह्मचारिणी, माता चंद्रघंटा, माता कुष्मांडा, माता स्कंदमाता, माता कात्यायनी, माता कालरात्रि, माता महागौरी और माता सिद्धिदात्री की पूजा और आराधना की जाती है।
माँ शैलपुत्री
कथा के अनुसार महादेव और सती के विवाह के बाद दक्ष प्रजापति ने एक यज्ञ का आयोजन किया। सभी देवताओं को आमंत्रित कर उसने अपनी पुत्री सती और महादेव को क्रोध में नहीं बुलाया। इसके बाद भी जब सती यज्ञ में आईं तब पिता दक्ष ने महादेव का अपमान किया। जिससे क्रोधित हो सतीने अपने आप को योग अग्नि से भस्म कर दिया। इसके बाद महादेव से मिलने के लिए उनका पुनः जन्म हुआ। माता ने पर्वतराज हिमालय की तपस्या से प्रसन्न हो कर उनके घर पुत्री के रूप में जन्म लिया। इसलिए वह ‘शैलपुत्री’ कहलाईं। एक हाथ में त्रिशूल और दूसरे हाथ में कलश लेकर वे वृषभदेव की सवारी करते हैं और हिमालय और कैलाश में निवास करते हैं। नवरात्रि के पहले दिन माता शैलपुत्री की पूजा की जाती है। माता को सफेद रंग प्रिय होने के कारण प्रसाद में सफेद फूल, सफेद फल, सफेद वस्त्र आदि सफेद चीजें चढ़ाने और सफेद मिठाई बनाने का महत्व है। माता शैलपुत्री की पूजा करने से सुख-समृद्धि आती है।
माता ब्रह्मचारिणी
‘ब्रह्मा’ का अर्थ है ‘तपस्या’ और ‘चारिणी’ का अर्थ है आचरण करने वाली, इस प्रकार माता का दूसरा रूप ‘तपस्विनी’ होने से उन्हें ‘ब्रह्मचारिणी’ के नाम से जाना जाता है। माता ने भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए वर्षों तक तपस्या की। उनके इस दूसरे स्वरूप की पूजा नवरात्रि के दूसरे दिन की जाती है। माता ब्रह्मचारिणी के हाथों में माला और कमंडल हैं। उनके इस रूप की पूजा करने से व्यक्ति को ज्ञान, धर्म, एकाग्रता और संयम बनाए रखने की शक्ति मिलती है और वह अपने कर्तव्य पथ से नहीं भटकता। माता ब्रह्मचारिणी की भक्ति से लंबी उम्र का वरदान भी मिलता है।
माता चंद्रघंटा
नवरात्रि के तीसरे दिन माता चंद्रघंटा की पूजा होती है। इनका रंग सोने जैसा चमकीला है। उन्हें ‘चंद्रघंटा’ के नाम से जाना जाता है क्योंकि वे अपने मस्तक पर ‘घंट’ के आकार का चंद्रमा यानी आधा चंद्रमा धारण करती हैं। कहा जाता है कि महादेव से विवाह के बाद माता पार्वती ने चंद्रमा को धारण करना शुरू किया था। उनकी दस भुजाएं हैं। जिनमें वे शस्त्र रखती हैं। वह गले में सफेद फूलों की माला और सिर पर रत्नजड़ित मुकुट पहनती हैं। चंद्रघंटा माता की पूजा करने से व्यक्ति में वीरता और निर्भयता के साथ-साथ सौभाग्य और विनम्रता का भी विकास होता है। इनकी पूजा करने से चेहरे, आँखे और पूरे शरीर में क्रांति आ जाती है। साथ ही हमारी आवाज दिव्य और सुरीली हो जाती है।
माँ कुष्मांडा
माँ कूष्माण्डा देवी आदिशक्ति का चौथा स्वरूप हैं। नवरात्रि के चौथे दिन इनकी पूजा की जाती है। ऐसा कहाते हैं कि जब ब्रह्मांड में कुछ भी नहीं था, केवल अंधकार था, तब माता के मंद हास्य करने से ब्रह्मांड का जन्म हुआ। माता कुष्मांडा सूर्य के समान तेजस्वी हैं और सूर्यमंडल में निवास करती हैं। मान्यता के अनुसार माँ को नारंगी रंग अत्यंत प्रिय है। इसलिए माता कुष्मांडा की पूजा नारंगी रंग के कपड़े या नारंगी रंग की वस्तुएं, फल, फूल, चंदन, कुमकुम, अक्षत आदि से करनी चाहिए। माता कुष्मांडा की पूजा में उन्हें लौंग, इलायची, सौंफ, कुम्हड़ा यानी पेठा चढ़ाएं। मां कुष्मांडा थोड़ी सी सेवा और भक्ति से भी प्रसन्न हो जाती हैं। इनकी पूजा करने से मानसिक शांति मिलती है।
माँ स्कंदमाता
नवरात्रि के पांचवें दिन माँ स्कंदमाता की पूजा की जाती है। ‘स्कंद’ का अर्थ है कुमार कार्तिकेय, जो महादेव के पुत्र हैं। पुराणों के अनुसार देवताओं और असुरों के बीच भयंकर युद्ध हुआ था। जिसमें कुमार कार्तिकेय देवताओं के सेनापति थे। उनकी माता का स्वरूप ‘स्कंदमाता’ कहलाया। उनके चार हाथ हैं। जिसमें एक हाथ से उन्होंने कुमार कार्तिकेय को पकड़ रखा है, दूसरे हाथ अभय मुद्रा में है, तीसरे हाथ में सफेद कमल है और चौथे हाथ में कमल का हार है। उनका वाहन सिंह है और वह कमल के फूल पर पद्मासन मुद्रा में बैठे हैं। उनके इस स्वरूप की पूजा करने से संतान की प्राप्ति होती है।
माँ कात्यायनी
छठे दिन माता कात्यायनी की पूजा की जाती है। शाक्त संप्रदाय में उन्हें दुर्गा, भद्रकाली, गौरी और चंडिका जैसे विभिन्न नामों से जाना जाता है। यह आदिशक्ति का रौद्र रूप है जिसने असुरों का संहार किया था। उनकी कहानियों का उल्लेख सबसे पहले यजुर्वेद के ‘तैतरीय आरण्यक’ में किया गया। इसके अलावा ‘स्कंद पुराण’, ‘देवी भागवत पुराण’ और ‘मार्कंडेय पुराण’ में भी उनके बारे में जानकारी मिलती है। उनकी भक्ति से रोग, शोक, संकट और भय नष्ट हो जाते हैं। जन्म जन्मान्तर के पाप भी नष्ट हो जाते हैं।
कात्य गोत्र के महर्षि कात्यायन ने ‘पुत्री’ पाने के लिए कठोर तपस्या की। अत: देवी आदिशक्ति उनकी पुत्री के रूप में अवतरित हुईं। इसीलिए उन्हें ‘कात्यायनी’ कहा गया। उनकी कृपा से सभी कार्य पूर्ण हो जाते हैं। वे वैद्यनाथ नामक स्थान पर प्रकट हुईं और तभी से उनकी पूजा शुरू हो गई। व्रज की गोपियों ने भगवान कृष्ण को पति के रूप में पाने के लिए कात्यायनी माता की ही पूजा की थी। यह पूजा कालिन्द्री यमुना के तट पर की गई थी। इसीलिए कात्यायनी माता को व्रजमंडल की अधिष्ठात्री देवी भी कहा जाता है। इनका स्वरूप अत्यंत भव्य एवं दिव्य है। उनकी चार भुजाएं हैं। उनका एक हाथ अभय मुद्रा में और दूसरा वरद मुद्रा में है। तीसरे हाथ में तलवार है और चौथे हाथ में कमल का फूल है। माता कात्यायनी की पूजा से भक्तों के रोग, शोक, संकट और भय का नाश होता है।
माँ कालरात्रि
नवरात्रि के सातवें दिन माता कालरात्रि की पूजा की जाती है। कथा के अनुसार शुम्भ-निशुम्भ नाम के असुरों और उनकी सेना को देखकर माता इतनी क्रोधित हुईं कि उनका शरीर काला पड़ गया। सभी असुरों का वध करने के कारण उन्हें ‘कालरात्रि’ के नाम से जाना गया। महाभारत में यह भी कहा गया है कि माता कालरात्रि महाकाली का ही एक रूप है जिन्होंने असुर राजा रक्तबीज का वध किया था। उनकी तीन आँखें हैं, गले में बिजली की एक अद्भुत माला है। उनके हाथों में खड़ग और कांटे हैं। साथ ही उनका वाहन गधा है। लेकिन सदैव भक्तों का कल्याण करने के कारण उन्हें ‘शुभंकरी’ भी कहा जाता है। इनकी पूजा से ग्रह बाधाएं और आकस्मिक संकट दूर हो जाते हैं। यह भी कहा जाता है कि माता कालरात्रि की पूजा करने से भूत, प्रेत, पिशाच जैसी नकारात्मक शक्तियां दूर हो जाती हैं। और व्यक्ति मनचाही उपलब्धियों को हासिल कर सकता है।
माता महागौरी
नवरात्रि के आठवें दिन देवी महागौरी की पूजा की जाती है। जैसा कि पहले बताया गया है, जब माता पार्वती ने महादेव को पाने के लिए कठोर तपस्या की तो उनका रंग काला हो गया। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर महादेव ने उन्हें दर्शन दिये तो उन्हें ‘गौर’ वर्ण का वरदान प्राप्त हुआ। वह फिर से रूपवती और सुंदर हो गईं और ‘महागौरी’ के नाम से विख्यात हुई। देवी की चार भुजाएं हैं। उनके एक हाथ में त्रिशूल और दूसरे हाथ में डमरू है। देवी का तीसरा हाथ अभय मुद्रा में और चौथा हाथ वरद मुद्रा में है। इनका वाहन वृषभ है। इसलिए इसे ‘वृशारूढ़ा’ भी कहा जाता है। माता महागौरी की पूजा करने से प्रिय जीवनसाथी मिलता है और वैवाहिक जीवन में भी सुख-शांति रहती है।
माता सिद्धिदात्री
नवरात्रि के नौवें दिन माता सिद्धिदात्री की पूजा की जाती है। वह कमल के फूल पर विराजमान हैं। उनके हाथों में गदा, चक्र, शंख और कमल का फूल है। मार्कंडेय पुराण के अनुसार, आदि शक्ति के इस रूप की पूजा करने से अणिमा, महिमा, लघिमा, गरिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व और वशित्व नामक आठ प्रकार की सिद्धियां प्राप्त होती हैं। इसीलिए उन्होंने ‘सिद्धिदात्री’ कहा है। इतना ही नहीं बल्कि देवी पुराण के अनुसार इनकी सहायता से ही भगवान महादेव ने ‘अर्धनारीश्वर’ का रूप धारण किया था। मान्यता के अनुसार माता सिद्धिदात्री भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूरी करती हैं और उन्हें यश, शक्ति और धन भी प्रदान करती हैं। शास्त्रों में माता सिद्धिदात्री को सिद्धि और मोक्ष की देवी माना गया है।
विजयादशमी – दशहरा का महत्व और कहानी
दशहरा कैसे मनाते है?
असो मास के शुक्ल पक्ष की दसवीं तिथि को विजयादशमी यानी ‘दशहरा’ पूरे भारत में बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है। यह पर्व सनातन संस्कृति की आस्था का प्रतीक है। धर्म के विनाश और धर्म की जीत का उत्सव मनाने के लिए सभी हिंदू स्थानीय रूप से गांवों और शहरों में इकट्ठा होते हैं। समूह में एक बड़े मैदान के बीच में रावण और मेघनाथ के घास के पुतले रखते हैं। रामवेश में लोग भगवान राम को याद करते हुए तीरों से पुतला जलाकर अधर्म पर धर्म की जीत का उत्सव मनाते हैं। छोटे और बड़े पैमाने पर मेले लगते हैं और सभी लोग मिलकर त्योहार मनाते हैं। दशहरे के दिन भगवान राम की पूजा की जाती है।

भगवान राम की स्तुति: रघुपति राघव राजा राम
दशहरा की कहानी: राम रावण युद्ध
भगवान राम के वनवास के दौरान लंकापति और असुरों के राजा रावण ने माता सीता का अपहरण कर लिया था। उन्हें बचाने के लिए भगवान राम, भाई लक्ष्मण, हनुमान और समस्त वानरसेना ने लंका पर आक्रमण किया। दोनों ओर से भयंकर युद्ध हुआ। एक-एक करके रावण के सभी सैनिक मरते गये। राम ने कुम्भकर्ण को भी अपने हाथ से परास्त कर दिया। रावण का सबसे बड़ा पुत्र इंद्रजीत, जिसे अजेय माना जाता था। उसे वरदान था कि केवल बारह वर्ष तक ब्रह्मचर्य का पालन करने वाला व्यक्ति ही उसे मार सकता था। वह भी लक्ष्मण के हाथों मारा गया। अंततः रावण को युद्ध में उतरना पड़ा। उसने लक्ष्मण पर तीक्ष्ण शक्ति फेंकी। यह उनके सीने में चली गया और वह बेहोश हो गया। इससे राम चिंतित हुए। लेकिन हनुमान नें अपनी शक्ति से संजीवनी औषधि ले आए और भाई लक्ष्मण ठीक हो गए। लक्ष्मण को पुनः स्वस्थ देखकर रावण का क्रोध बढ़ गया। अत: वह पुनः राम के विरुद्ध युद्ध करने के आ गया। राम और रावण के बीच भयानक युद्ध छिड़ गया। ठीक दसवें दिन भगवान राम ने रावण की नाभि में एक दिव्य तीर मारा और रावण का वध किया। भगवान राम की जीत धर्म की जीत थी और रावण की हार अधर्म की हार थी। तभी तीनों लोको ने उत्सव मनाया। आज भी इस कथा को याद करके दशहरा धूमधाम से मनाया जाता है।

इस साल शारदीय नवरात्रि आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि यानी 3 अक्टूबर से शुरू हो रही है।
नवरात्रि नौ दिनों की होती है।
नवरात्रि के पहले दिन सुबह जल्दी उठें, स्नान करें, साफ कपड़े पहनें और घर के मंदिर में गंगा जल छिड़कें। उसके बाद कंकू, लाल चंदन, लाल चूनर और श्रृंगार के साथ बाजोठ पर माता की मूर्ति, छवि या प्रतीक को स्थापित करें और स्नान, अभिषेक और पूजा करें।
कलश स्थापन या घटस्थापना नवरात्रि के पहले दिन उत्तर या उत्तर-पूर्व दिशा में की जाती है। जिसके लिए मिट्टी के बर्तन में जौ या गेहूं बोया जाते हैं और उसके ऊपर कलश को शुद्ध जल और गंगा जल भरकर रखा जाता है। उस कलश में अक्षत, दूर्वा, सुपारी और सिक्का डाला जाता है और कलश को कलावा बाँधा जाता है। उसमें पाँच आम के पत्ते रख कर नारियल रखा जाता है। कलश को कलावा बांध दिया जाता है और उस पर सूखा नारियल रखते है। नारियल को भी कलावा बांधकर रखा जाता है।
एक मिट्टी का गरबा एक छोटे बाजोठ पर रखा जाता है जिसे सुंदर रंगों से सजाया जाता है । उसमे मूंग का ढेर लगा कर इसके अंदर एक दीपक भी रखना चाहिए।
नवरात्रि के पहले दिन माता शैलपुत्री की पूजा की जाती है।
नवरात्रि के दूसरे दिन माता ब्रह्मचारिणी की पूजा की जाती है।
नवरात्रि के तीसरे दिन माता चंद्रघंटा की पूजा की जाती है।
नवरात्रि के चौथे दिन कुष्मांडा माता की पूजा की जाती है।
नवरात्रि के पांचवें दिन माँ स्कंदमाता की पूजा की जाती है।
नवरात्रि के छठे दिन देवी कात्यायनी की पूजा की जाती है।
नवरात्रि के सातवें दिन कालरात्रि माता की पूजा की जाती है।
नवरात्रि के आठवें दिन देवी महागौरी की पूजा की जाती है।
नवरात्रि के नौवें दिन माता सिद्धिदात्री की पूजा की जाती है।
इस साल दशहरा अश्विन सुद दशम यानि 12 अक्टूबर को है।
माता शैलपुत्री, माता ब्रह्मचारिणी, माता चंद्रघंटा, माता कुष्मांडा, माता स्कंदमाता, माता कात्यायनी, माता कालरात्रि, माता महागौरी और सिद्धिदात्री माता आदि शक्ति के नौ रूप हैं।