गणेश चतुर्थी क्यों मनाई जाती है? गणेश चतुर्थी की कथा और महिमा | पर्व की पाठशाला
Column: पर्व की पाठशाला | Writer: डॉ. कृपेश ठक्कर
भगवान गणेश हिंदू धर्म में प्रमुख देवताओं में से एक हैं और उनका जन्मदिन यानी भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी यानि ‘गणेश चतुर्थी’ है। वैसे तो उनके नाम बारह, एक सौ आठ और एक हजार आठ हैं। लेकिन मुख्य रूप से उन्हें कई नामों से जाना जाता है जैसे देवगण के ‘ईश’ यानी ‘गणेश’, देवों के अधिपति यानी ‘गणपति’, विघ्नों को हरने वाले ‘विघ्नहर्ता’ और छोटे-बड़े सभी के प्रिय ‘गणपति बप्पा’। उनके प्रत्येक नाम का एक विशेष अर्थ और विशेष महत्व है। चाहे वह कोई भी प्रांत हो, राज्य हो या कोई भी संप्रदाय; प्रत्येक शुभ कार्य से पहले भगवान गणेश की पूजा की जाती है। सनातन संस्कृति में इनका प्रमुख स्थान है। इसलिए कह सकते है कि ‘गणेश चतुर्थी’ सिर्फ एक त्योहार नहीं बल्कि वर्षों से चली आ रही एक परंपरा है। ‘पर्व की पाठशाला’ में हम जानेंगे ‘गणेश चतुर्थी’ का महत्व और उनके जन्म की कहानी!

कब है गणेश चतुर्थी?
इस साल 2024 में गणेश चतुर्थी का त्योहार 7 सितंबर से शुरू हो रहा है। जो आमतौर पर दस दिनों तक चलता है। गणेश चतुर्थी को लोग व्यक्तिगत और सामूहिक दोनों तरह से मनाते हैं। घर, चौराहे और सोसायटी में मंडप बंधे जाते हैं। उसे तरह तरह के फूलों और रंगीन रोशनी से सजाया जाता है। परिवार के सदस्य और सभी लोग मिलकर गणपति बप्पा की सुंदर मूर्ति लाते हैं। विधि-विधान से पूजा-अर्चना के साथ मूर्ति स्थापित की जाती है और फिर पूजा, आरती, भोग और प्रसाद का क्रम चलता है। उत्साही वर्ग में विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रमों के साथ उत्सव मनाया जाता है। इस प्रकार तीन, पांच या दस दिन तक भगवान गणपति की सेवा करने के बाद निश्चित समय पर उनका विसर्जन किया जाता है। लोगों को पूरा विश्वास है कि गणपति के आगमन से सभी का कल्याण होगा और विघ्न दूर होंगे। साथ ही विसर्जन होने के बाद भी बप्पा अगले साल फिर से आने का इंतजार भी रहता है।

किसी भी शुभ कार्य को करने से पहले भगवान गणेश की पूजा की जाती है। भगवान गणेश को बुद्धि और ज्ञान का देवता माना जाता है। उनके बड़े कान मनुष्य को एक अच्छे श्रोता बनने और बड़े पेट को ज्ञान ग्रहण करने प्रतीक मानते हैं। वह सबका कल्याण करने वाले और संकट को हरने वाले भगवान हैं। गणेश चतुर्थी के दौरान भक्त व्रत और उपवास के माध्यम से भी भक्ति करते हैं। जिससे मनोवांछित फल मिलता है। हर पूजा और हवन तथा दीपक जलाते समय सबसे पहले गणेश जी को इस श्लोक से याद किया जाता है।
“वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ।
निर्विघ्नं कुरुमे देव सर्व करेषु सर्वदा।।”
गणेश मंत्र 108
गणेश चतुर्थी की कहानी
गणेश चतुर्थी यानी भगवान गणेश के जन्मदिन की कहानी हर किसी की पसंद है। पुराणों के अनुसार, एक बार भगवान शंकर की अनुपस्थिति में माता पार्वती ने अपने शरीर पर लगे उबटन से एक बालक की मूर्ति बनाई और उसमें प्राण भरे, जिससे ‘गौरी पुत्र’ का जन्म हुआ। स्नान के लिए जाने से पहले माता पार्वती ने उन्हें आदेश दिया कि वे द्वार पर पहरा देते रहें और किसी को भी बिना अनुमति के प्रवेश न करने दें। जब भगवान शंकर आते हैं तो गौरी पुत्र उन्हें रोकते हैं। महादेव और गौरी पुत्र के बीच एक विवाद हो जाता है। जिसमें वह भगवान शंकर की बात ना मानकर अपनी माता की आज्ञा मानते हैं। परिणामस्वरूप दोनों के बीच युद्ध छिड़ गया और महादेव ने त्रिशूल के प्रहार से गौरी पुत्र का सिर धड़ से अलग कर दिया। इस दुर्घटना से माता पार्वती बहुत व्यथित हुईं।

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भगवान ब्रह्मा और विष्णु सहित सभी देवता प्रकट हुए और समस्या को हल करने का प्रयास किया। महादेव ने देवताओं को आदेश दिया कि जिस भी बच्चे की माँ विपरीत दिशा की ओर मुँह करके बैठी हो उसका सिर ले आएं। आदेश के अनुसार, देवताओं को सबसे पहले एक हाथी और उसका बच्चा मिला, इसलिए वे हाथी के बच्चे का सिर ले आये। महादेव ने उस हाथी का सिर गौरी पुत्र के धड़ से जोड़ दिया और उसे जीवनदान दे दिया। इस प्रकार हाथी के मुख वाले ‘गजानन’ का जन्म हुआ।
ब्रह्मा, विष्णु और महादेव सहित सभी देवताओं ने उसे अपार शक्ति प्रदान की। वह सभी देवताओं के अधिपति के रूप में ‘गणपति’ बन गये। उन्हें सभी बाधाओं और संकट को दूर करने का वरदान प्राप्त हुआ। बुद्धि और ज्ञान के दाता होने का स्थान मिला। प्रत्येक पूजा में और यज्ञ में उन्हे प्रथम स्थान दिया गया और वह दिन हमेशा के लिए ‘गणेश चतुर्थी’ के रूप में मनाया जाने लगा।

हालाँकि, गणेश चतुर्थी के साथ गणेश विसर्जन की ‘अनंत चतुर्दर्शी’ के लिए भी एक पुराणिक कथा मिलती है। इससे पहले हमने ‘पर्व की पाठशाला’ में जाना कि महाभारत लिखते समय भगवान गणेश लेखक बने थे और वेद व्यास कथाकार बने थे। शर्तों के अनुसार, व्यास बिना एक पल के विलंब किए लगातार कथा सुना रहे थे और बिना आराम किए ही गणेश जी लिख रहे थे। इसलिए ठीक दसवें दिन श्री गणेश के शरीर का तापमान बढ़ गया। अत: व्यास ने उन्हें जल में बैठाकर स्नान कराया। उस कथा के अनुसार गणेश चतुर्थी के दस दिन बाद गणेश विसर्जन की मान्यता मानी जाती है।
भगवान गणेश की प्रार्थना और आरती
इस साल 2024 में गणेश चतुर्थी उत्सव 7 सितंबर से शुरू हो रहा है।
मुख्य रूप से उन्हें कई नामों से जाना जाता है जैसे देवगण के ‘ईश’ यानी ‘गणेश’, देवों के अधिपति यानी ‘गणपति’, विघ्नों को हरने वाले ‘विघ्नहर्ता’ और छोटे-बड़े सभी के प्रिय ‘गणपति बप्पा’ के नाम से जाना जाता है।
गणेश चतुर्थी के दौरान भक्त व्रत और उपवास के माध्यम से भी भक्ति करते हैं। गणपति की स्थापना करते हैं और पूजा, आरती और भोग लगाते हैं। जिससे मनोवांछित फल मिलता है।
पुराणों के अनुसार एक बार भगवान शंकर की अनुपस्थिति में माता पार्वती ने अपने शरीर पर लगे उबटन से एक बालक की मूर्ति बनाई और उसमें प्राण डाल दिया, जिससे ‘गौरी पुत्र गणेश’ का जन्म हुआ।
रिद्धि और सिद्धि भगवान गणेश की पत्नियां हैं।
शुभ और लाभ भगवान गणेश के पुत्र हैं।
‘गणेश’ भगवान गणपति का एक नाम है जिसका अर्थ है सभी देवगण के ‘ईश’।
गणेश के माता-पिता भगवान शिव और पार्वती हैं।
भगवान कार्तिकेय गणेश जी के भाई हैं।
गणेश जी की बहन का नाम अशोक सुंदरी है।
भगवान गणेश का वाहन मूषक है।
मोदक और लड्डू भगवान गणेश को प्रिय हैं इसलिए भोग में लगाए जाते हैं।